28 जनवरी 2012

मैं

अहं की 
अभिव्यक्ति
मैं से शुरू
मैं से इति
मैं बेहतर
तू कमतर 
मैं आकाश 
तू थलचर
मैं रसना
मैं श्रुति
मैं दृष्टा
मैं श्रृष्टि  
तू आलोचक
मैं कृति
सब पराये
मेरा दुर्योधन
मैं स्वीकृति
मैं अनुमोदन
मैं ही प्रश्न 
मैं ही उत्तर 
मैं ही सत्य
तू निरुत्तर
मोह की हवा
फूला गुब्बारा 
फटा तो
बचा न
मोह न मैं 

29 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर!!
    अहं का अंत होना ही था...
    माँ सरस्वती की कृपा आप पर बनी रहे..

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  2. बहुत सुन्दर,सार्थक प्रस्तुति।

    ऋतुराज वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  3. अहम की संतुष्ठी और 'मैं' का प्रहार ..शब्दलोक से निकले जोरदार शब्दों की जोरदार अभिव्यक्ति ..बधाई विशाल ...तुम्हारी कलम दिनबदिन पैनी होती जा रही हैं ...

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  4. बहुत सुन्दर भाव और शब्द संयोजन... वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ...

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  5. गुब्बारा फूटने पर न मोह बचा न मैं ... सटीक भाव .. अच्छी प्रस्तुति

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  6. अर्थात -
    मम किंचन न ( मेरा कुछ भी नहीं )
    शाश्वत सत्य..

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  7. ''मैं '' से मैं का सुन्दर परिचय

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  8. सुन्दर और संवेदनशील.....

    अगर हम समझ सकें तो....



    अहं की
    अभिव्यक्ति

    मैं से शुरू
    मैं से इति
    मैं बेहतर
    तू कमतर
    .............
    ..............
    मैं रसना
    मैं श्रुति
    मैं दृष्टा
    मैं श्रृष्टि
    तू आलोचक
    मैं कृति
    सब पराये
    ........
    .......
    मैं स्वीकृति
    मैं अनुमोदन
    मैं ही प्रश्न
    मैं ही उत्तर
    मैं ही सत्य
    तू निरुत्तर
    ........
    ........
    अब इस "मैं"से कोई छुट्टी दिलाये तो....
    जो कहता है उसे तो इसका ज़रा भी
    एहसास ही नहीं रहता की वो क्या कह रहा है...
    गुब्बारा भी फूटता है तो उसमें से भी मैं ही निकलता है.....!!
    काश......इतना आसान हो पाता
    थोडा तो मोह भंग हो पाता...!!

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  9. और कमाल यह कि यह "मैं" है कौन, यही नहीं मालूम... मैं शरीर हूँ, मैं मन हूँ, मैं आत्मा हूँ.. कौन हूँ मैं!!

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  10. इस ’मैं’ के ही रोने हैं विशाल भाई, हमरी न मानो तो चचा गालिब से पूछो जिसने लिख दीन्हा कि ’डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता’

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  11. मोह की हवा
    फूला गुब्बारा
    फटा तो
    बचा न
    मोह न मैं
    बहुत बेहतरीन सटीक अभिव्यक्ति ..

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  12. गुब्बारा फटता है तो कुछ नहीं बचता सच है...

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  13. मैं नहीं तो मोह भी नहीं ।
    वाह, भावपूर्ण अच्छी कविता।

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  14. मेरा मुझमें कुछ नहीं … … …

    बहुत अच्छी कविता लिखी प्रिय बंधुवर विशाल जी !

    मैं से शुरू
    मैं से इति
    मैं बेहतर

    मैं आकाश

    मैं रसना
    मैं श्रुति

    मैं दृष्टा
    मैं श्रृष्टि

    मैं कृति

    मैं स्वीकृति
    मैं अनुमोदन

    मैं ही प्रश्न
    मैं ही उत्तर

    मैं ही सत्य

    सच, यही भ्रम लिये रहते हैं हम

    कविता का समापन 'सत्य' और 'संदेश' समाहित किए हुए है …
    फूला गुब्बारा
    फटा तो
    बचा न
    मोह न मैं

    सुंदर रचना ! बधाई !

    हार्दिक शुभकामनाओं-मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  15. बहुत सुन्दर...
    अहम् टूटा....तभी मैं मिला...
    सादर.

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  16. बहुत सुन्दर!
    सादर शुभकानाएँ

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  17. bahut sundar
    vaah! vaah! vaah!

    ahm ka gubbaara phoota
    aah! aah! aah!

    aah! se hi to nikal pada
    phir allah! allah! allah!

    mai mara to raam ho gaya.
    chain mila aaraam ho gaya.

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  18. कविता पढ़ते ही दिल -दिमाग उसकी भावाव्यक्ति में ड़ूब गये |सुन्दर सृजन के लिए बधाई है |

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  19. वाह बहुत खूब लिखा है आपने, मन भाया.

    शुभकामनायें

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  20. शब्दों की मितव्ययिता की है, पर भावों की नहीं...सुन्दर

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  21. मंजिल न दे ,चिराग न दे , हौसला तो दे.
    तिनके का ही सही, मगर आसरा तो दे.
    मैंने ये कब कहा कि मेरे हक में हो जबाब
    लेकिन खामोश क्यों है कोई फैसला तो दे.

    खामोश तो आप हैं विशाल भाई.
    इतनी खामोशी भी अच्छी नही जी.

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  22. विशाल जी
    नमस्कार !

    आशा है सपरिवार स्वस्थ सानंद हैं
    नई पोस्ट बदले हुए बहुत समय हो गया है …
    आपकी प्रतीक्षा है सारे हिंदी ब्लॉगजगत को …
    :)

    शुभकामनाओं सहित…
    राजेन्द्र स्वर्णकार

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  23. पधारो महाराज, साल बदलने वाला हो गया अब तो।

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मंजिल न दे ,चिराग न दे , हौसला तो दे.
तिनके का ही सही, मगर आसरा तो दे.
मैंने ये कब कहा कि मेरे हक में हो जबाब
लेकिन खामोश क्यों है कोई फैसला तो दे.