21 अप्रैल 2011

दर्द की दुकाँ

{इक दर्द के मुजस्सिम के नाम,जिसे लोग 'हीर' कहा करते हैं.}

खुदाया, 
खूब बनाई है तूने,
दर्द की दुकाँ,
खूब सजाई है तूने,
दर्द की दुकाँ,
दर्द की ईंट ,दर्द का गारा,

दर्द के दरवाजे ,खिड़कियाँ,

दर्द का अर्श,दर्द का फर्श,

दर्द का ही,हर मालो सामां,

आह ओ अश्क,रंज ओ गम,

ज़ख्म ,फफोले और सिसकियाँ,
और कोई मौसम यहाँ आता नहीं

हर सिम्त,हर वक़्त ,रहती है खिजाँ, 

दर्द ही खुद ताज़िर बना बैठा है,

बिन तोले ही बेचे है सामां,

इक भीड़ लगी रहती है खरीदारों की,

कैसे हैं लोग,हूँ मैं हैरां,

सभी हंस हंस के खुशियाँ लुटा जाते है,

ले जाते हैं दर्द ,भर भर झोलियाँ,

मैं भी थोड़ा दर्द,ओक में भर लूं,

मेरे भी कुछ ज़ख्म, हो गए हैं जवाँ,

गौर से देखूं ,तो ऐसा लगता है,

तू भी छुप के, बैठा है यहाँ,

खुदाया,

खूब बनाई है तूने,

दर्द की दुकाँ,

खूब सजाई है तूने,

दर्द की दुकाँ.

53 टिप्‍पणियां:

  1. आज जब दर्द में हूँ मैं भी ज़रा देखो विशाल,
    दर्द इस नज़्म का मैं रूह से पहचानता हूँ!
    बहुत ख़ूबसूरत... दर्द का बयान दर्दको महसूस करने पर मजबूर कर देता है..

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. कहा…
    एक आला शायर का कलाम है,
    "इश्क से तबीयत ने, ज़ीस्त का मजा पाया,
    इलाजे दर्दे-दिल पाया ओ दर्दे बेदवा पाया"

    विशाल जी, मुझे तो वो लोग खुशकिस्मत लगते हैं जो दर्द को महसूस कर पाते हैं। शायद आपका ख्याल भी ऐसा ही है।

    बहुत खूब लगी ये दर्द की दुकां।

    उत्तर देंहटाएं
  4. खुदाया,
    खूब बनाई है तूने,
    दर्द की दुकाँ,
    खूब सजाई है तूने,
    दर्द की दुकाँ.
    bahut hi khoobsurat .

    उत्तर देंहटाएं
  5. और कोई मौसम यहाँ आता नहीं
    हर सिम्त,हर वक़्त ,रहती है खिजाँ,
    दर्द ही खुद ताज़िर बना बैठा है,

    विशाल जी
    आपने बहुत सुन्दरता से दर्द कि दुकां को अभिव्यक्त किया है ...हर एक शब्द गहरा अहसास अभिव्यक्त कर गया ..बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत कम समझ पाती हूँ ...कोई भी गज़ल या नज़्म..
    पर दर्द...दर्द को दिल से महसूस किया है तो...
    हमेशा खुली ही मिली है दर्द की दूकाँ....

    उत्तर देंहटाएं
  7. विशाल भाई,
    बहुत खूब. अब दर्द की दुकान भी सजवा दी 'हीर' जी के नाम पर.
    भाई ,बड़ा महंगा है दर्द खरीदना.आजकल तो गाँठ में सरमाया नहीं,कुछ कमाई करनी पड़ेगी.वर्ना तो 'पैसा न पास,मेला लगे उदास'
    आप अपनी लेखनी को कोई काला टीका-वीका लगवाओ,कहीं नजर न लग जाये किसी की.

    उत्तर देंहटाएं
  8. " बेचेनियाँ सारे जहां की समेटकर ,
    जब कुछ न बन सका,तो मेरा दिल बना दिया !"

    हीर जी पर यह पंक्तियाँ एकदम फिट बैठती है --
    हीर जी को दिया आपका यह तोहफा 'दर्द की दुकाँ' बहुत सुंदर लगा --

    उत्तर देंहटाएं
  9. बस दुख दर्द को जो अमृत द्समझ कर पी लेता है वही तो जीवन का पूरा आनन्द ले पाता है। रचना बहुत अच्छी लगी और इसी पर अपनी एक गज़ल के दो शेर आपकी खिदमत मे----
    कसक दुख दर्द बिना ये ज़िन्दगी अच्छी नही लगती
    मुझे अब आँसूओं से दुश्मनी अच्छी नही लगती
    खुशी की बात पर हसना उसे अच्छा नही लगता
    मुझे उसकी यही संज़ीदगी अच्छी नही लगती

    उत्तर देंहटाएं
  10. दर्द का ताज़महल बना दिया।

    उत्तर देंहटाएं
  11. दर्द की दूकां......जिंदगी का फलसफा

    भावपूर्ण रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  12. वाह विशाल जी! आपने तो सचमुच अहसास की दुकान खोल ली..बहुत खूब!
    ---देवेंद्र गौतम

    उत्तर देंहटाएं
  13. दर्द की दूकां......
    भावुक...सुन्दर...मर्मस्पर्शी भावाभिव्यक्ति....
    आपकी कविताएं मन को छूने में कामयाब रहती हैं |
    बधाई और शुभकामनाएं |

    उत्तर देंहटाएं
  14. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  15. दर्द के सौदागर भी कम नहीं है जान कर अच्छा लगा.
    वैसे बकौल ग़ालिब, " दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना "

    दर्द और जज़्बात में डूबी हुई एक बेहतरीन रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  16. हाय ज़ालिम! अभी तक ‘हीर’ ही ने नहीं देखा :(

    उत्तर देंहटाएं
  17. मैं भी थोड़ा दर्द,ओक में भर लूं,

    मेरे भी कुछ ज़ख्म, हो गए हैं जवाँ,

    गौर से देखूं ,तो ऐसा लगता है,

    तू भी छुप के, बैठा है यहाँ,

    खुदाया,...

    ..एक सुन्दर रचना विशाल जी बधाई..

    उत्तर देंहटाएं
  18. अहा रचना में बहुत सारे दर्द पता चले..बहुत सुन्दर ...आनंद आ गया ... बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  19. गौर से देखूं ,तो ऐसा लगता है,

    तू भी छुप के, बैठा है यहाँ,

    खुदाया,

    खूब बनाई है तूने,

    दर्द की दुकाँ,

    भावुक...लाजवाब...मर्मस्पर्शी भावाभिव्यक्ति....
    दर्द भरे जज़्बात में डूबी सी.....

    उत्तर देंहटाएं
  20. दर्द में जो दर्द है ..जो दर्द देकर ही दर्द को कम करता है..इस दर्द को पाने के लिए सम्पूर्ण जीवन कम पड़ जाता है..इसलिए दर्द में मीरा भी कह गयी----सूली ऊपर सेज पिया की ,किस विधि सोना होय ..बेहद खुबसूरत ...

    उत्तर देंहटाएं
  21. बिल्कुल दिल को छू लेने वाली अभिव्यक्ति....कई बार पढ़ने को जी चाहा...कई बार पढ़ा भी...

    उत्तर देंहटाएं
  22. विशाल , हीर जी पर दस्ताने दर्द लिखना एक विशालकाय काम है ।
    आपने कर दिखाया ।
    सुन्दर प्रस्तुति ।
    लेकिन हीर जी से अनुमति तो ले ली थी ना ।

    उत्तर देंहटाएं
  23. गहन अभिव्यक्ति.... दर्द का हर रंग शामिल कर लिया...
    मन को छू गयी प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  24. डा . दराल जी, क्षमा करें , ' दस्ताने ' की जगह " दासताने ' अपेक्षित था .

    उत्तर देंहटाएं
  25. वाकई
    दर्द को बुलन्द दर्जे पर पहुँचा दिया है आपने ।

    उत्तर देंहटाएं
  26. बहुत खूबसूरती से सजाई है आपने यह दुकान....
    कुछ पंक्तियाँ घुमड़ आईं...

    "दर्द की बुनियाद,ज़न्दगी का महल
    दर्द यहाँ अमृत, खुशियाँ हैं गरल.
    दर्द की ज़मीं और दर्द के बीज
    दर्द है दरख्ते मसर्रत का फल."

    सादर...

    उत्तर देंहटाएं
  27. पढ़कर तो खुशी मिली भले हो दर्द की दुकान

    उत्तर देंहटाएं
  28. और कोई मौसम यहाँ आता नहीं
    हर सिम्त,हर वक़्त ,रहती है खिजाँ,
    दर्द ही खुद ताज़िर बना बैठा है,
    khoobsoorat

    उत्तर देंहटाएं
  29. "गौर से देखूं ,तो ऐसा लगता है,
    तू भी छुप के, बैठा है यहाँ,
    खुदाया,
    खूब बनाई है तूने,
    दर्द की दुकाँ,
    खूब सजाई है तूने,
    दर्द की दुकाँ."

    बेहद खूबसूरत...

    हर दर्द में जब
    "वो" शामिल
    तो फिर दर्द कहाँ
    ए खुदा तेरी ही है
    ये दर्द की दुकान..!!

    उत्तर देंहटाएं
  30. विशाल भाई,
    बहुत खूब गहन अभिव्यक्ति...मन को छू गयी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  31. विशाल जी,

    आपकी पोस्ट बहुत शानदार है.....ज़बरदस्त लगी....

    पर जहाँ तक मुझे लगा ये ब्लॉगजगत में ही किसी को समर्पित की है अगर ऐसा था तो खुल के लिखना चाहिए था.......पर ज़रा ख्याल से यहाँ चेहरे पर चेहरे चढ़े हैं......दर्द के आढ़ में पीछे कहीं गहरी नफरत की दिवार खड़ी कर रखी है लोगों ने........पोस्ट अच्छी लगी आपकी.....

    उत्तर देंहटाएं
  32. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  33. ले जाते हैं दर्द ,भर भर झोलियाँ,
    मैं भी थोड़ा दर्द,ओक में भर लूं,
    मेरे भी कुछ ज़ख्म, हो गए हैं जवाँ,
    गौर से देखूं ,तो ऐसा लगता है,
    तू भी छुप के, बैठा है यहाँ,

    दर्द को दर्शाता यह दार्शनिक दास्तान दर्द दूर करने वाला है।

    उत्तर देंहटाएं
  34. राम-राम जी,
    दर्द, भी किस्मत से ही मिलता है।

    उत्तर देंहटाएं
  35. Dard ... kitna sukoon deta hai kisi ko aur kisi ko dard ... ye khuda bhi jaise dard ki dukaan pe baitha hai muft mein baantta ... lajawaab rachna hai ...

    उत्तर देंहटाएं
  36. बढ़िया प्रस्तुति ....शुभकामनायें !

    उत्तर देंहटाएं
  37. namaskar ji
    blog par kafi dino se nahi aa paya mafi chahata hoon

    उत्तर देंहटाएं
  38. विशाल जी ,
    आपकी भावनाओं को सलाम .....
    ये नज़्म मेरी धरोहर है .....
    मेरी कमाई है ...
    मेरा उपहार है ....
    मेरा सम्मान है ....
    लिए जा रही हूँ ...
    नम आँखों से .....

    आप मुझे एक संदेशा दे सकते थे विशाल जी पता ही न चला ....
    न किसी और ने बताया ....

    @ पर ज़रा ख्याल से यहाँ चेहरे पर चेहरे चढ़े हैं......दर्द के आढ़ में पीछे कहीं गहरी नफरत की दिवार खड़ी कर रखी है लोगों ने..
    आद अंसारी जी मैं आज भी आपका उतना ही सम्मान करती हूँ ...
    आप एक अच्छे इंसान है ...आपकी सोच आपके विचार आपके चरित्र के परिचायक हैं .....
    रोष था तो इस बात का की आप सब ने मुझे गलत समझा ...
    खैर किसी के ब्लॉग में इस तरह की टिपण्णी से आपको काफी राहत मिल गई होगी ....

    उत्तर देंहटाएं
  39. ले जाते हैं दर्द ,भर भर झोलियाँ,
    मैं भी थोड़ा दर्द,ओक में भर लूं,
    मेरे भी कुछ ज़ख्म, हो गए हैं जवाँ,
    गौर से देखूं ,तो ऐसा लगता है,
    तू भी छुप के, बैठा है यहाँ,

    अच्छी लगी दर्द कि दूकान.

    उत्तर देंहटाएं
  40. विशाल जी ने बेमिसाल नज़राना पेश किया है दर्द का ताजमहल बनाकर. और हीर ने भी अपने बड़े ही ख़ूबसूरत अंदाज़ में उसे क़ुबूल किया है. मोहब्बत तो हमें भी है हीर जी के दर्द से पर विशाल जी ! बाज़ी आप मार ले गए ये नज़राना पेश करके. कभी हमने भी लिखी थीं चंद लाइनें उनकी ख़िदमत में मगर आज बड़ी बौनी लग रही हैं.
    @ इमरान अंसारी जी ! जहां दर्द है वहाँ नफ़रत की कोई दीवार हो ही नहीं सकती. आज पूरी भीड़ में एकदम अकेले नज़र आ रहे हैं आप. और इसे पूरी दुनिया ने देख लिया है. अगर आपके दिल में इज्ज़त नहीं है हीर जी के लिए तो न सही ..पर यूँ सरे आम उनके चाहने वालों का दिल तो न दुखाइये.

    उत्तर देंहटाएं
  41. वाह क्या बात है दर्द को भी इतनी खूबसूरती से सज़ा दिया कि दर्द का एहसास भी खुबसूरत होने लगा |
    बहुत सुन्दर रचना |

    उत्तर देंहटाएं
  42. खुदाया,
    खूब बनाई है तूने,
    दर्द की दुकाँ,
    खूब सजाई है तूने,
    दर्द की दुकाँ.
    bahut hi khoobsurat .

    उत्तर देंहटाएं
  43. 'दर्द की दुकां' खोले तो काफी दिन हो गए विशाल भाई.सुना है आजकल 'प्रेम' और 'आनंद' का कारोबार भी बड़े पैमाने पर कर रहें हैं आप . तो फिर एक दुकां और 'प्रेम' और 'आनंद' की ,नाम 'हीर' जी के ही कर दीजियेगा उसे भी .

    उत्तर देंहटाएं
  44. और कोई मौसम यहाँ आता नहीं
    हर सिम्त,हर वक़्त ,रहती है खिजाँ,
    दर्द ही खुद ताज़िर बना बैठा है,

    बेहद दर्द भरी पंक्तियाँ ...पर ख़ूबसूरत भी
    सुन्दर नज़्म

    उत्तर देंहटाएं
  45. खुदाया,

    खूब बनाई है तूने,

    दर्द की दुकाँ,

    खूब सजाई है तूने,

    दर्द की दुकाँ...

    Awesome !...I'm genuinely liking it.

    .

    उत्तर देंहटाएं
  46. कृपया दर्द की दुकान हटा कर ख़ुशी की दुकान लगायें सारा जीवन ख़ुशी से भर जायेगा !

    उत्तर देंहटाएं
  47. गौर से देखूं ,तो ऐसा लगता है,
    तू भी छुप के, बैठा है यहाँ,
    खुदाया.....

    दर्द भरी पंक्तियाँ ...बहुत खूब .

    उत्तर देंहटाएं
  48. विशाल जी प्रणाम !

    "खूब बनाई है तूने,
    दर्द की दुकाँ,
    खूब सजाई है तूने,
    दर्द की दुकाँ."

    बहुत खूब कही ....
    ये बेहतरीन रचना आपने हीर जी को समर्पित कर के इसका मान और बढ़ा दिया....

    उत्तर देंहटाएं
  49. विशाल आपने तो दर्द की दुकान ही खोल डाली! उसमे तो ताले भी नही डाले! बहुत खुब!

    उत्तर देंहटाएं
  50. आज फिर एक बार पढ़ा....जितनी भी बार पढ़ती हूँ लगता है पहली बार पढ़ रही हूँ...हर बार नई भावनाएँ, नए अनुभव लिए सामने आती है यह रचना...

    उत्तर देंहटाएं

मंजिल न दे ,चिराग न दे , हौसला तो दे.
तिनके का ही सही, मगर आसरा तो दे.
मैंने ये कब कहा कि मेरे हक में हो जबाब
लेकिन खामोश क्यों है कोई फैसला तो दे.