{इक दर्द के मुजस्सिम के नाम,जिसे लोग 'हीर' कहा करते हैं.}
खुदाया,
खूब बनाई है तूने,
दर्द की दुकाँ,
खूब सजाई है तूने,
दर्द की दुकाँ,
दर्द की ईंट ,दर्द का गारा,
दर्द के दरवाजे ,खिड़कियाँ,
दर्द का अर्श,दर्द का फर्श,
दर्द का ही,हर मालो सामां,
आह ओ अश्क,रंज ओ गम,
ज़ख्म ,फफोले और सिसकियाँ,
और कोई मौसम यहाँ आता नहीं
हर सिम्त,हर वक़्त ,रहती है खिजाँ,
दर्द ही खुद ताज़िर बना बैठा है,
बिन तोले ही बेचे है सामां,
इक भीड़ लगी रहती है खरीदारों की,
कैसे हैं लोग,हूँ मैं हैरां,
सभी हंस हंस के खुशियाँ लुटा जाते है,
ले जाते हैं दर्द ,भर भर झोलियाँ,
मैं भी थोड़ा दर्द,ओक में भर लूं,
मेरे भी कुछ ज़ख्म, हो गए हैं जवाँ,
गौर से देखूं ,तो ऐसा लगता है,
तू भी छुप के, बैठा है यहाँ,
खुदाया,
खूब बनाई है तूने,
दर्द की दुकाँ,
खूब सजाई है तूने,
दर्द की दुकाँ.