12 जुलाई 2011

पागल सवालात

मैं रुका हुआ हूँ,
दुनिया दौड़ी चली जाती क्यों है,
हर तरफ़ है ग़मज़दा चेहरे,
मुझको हंसी आती क्यों है,
किनारे पे खड़े हुए हैं सब,
मैं डूबना चाहता क्योंकर,
हर कोई जुड़ने को बेकरार,
मैं टूटना चाहता क्योंकर,
पुती दीवारें हैं हर तरफ़,
मैं खाली झरोखा क्यों हूँ,
सभी तकते हैं जमीं को,
मैं आसमां तकता क्यों हूँ, 
कोई खरीदार नहीं है,
फिर भी मैं बिकता क्यों हूँ,
जब सिर्फ़ पढ़ते हैं ज़ेहन वाले,
मैं दिल से लिखता क्यों हूँ,
तमाशबीनों की भीड़ में ,
मैं ही तमाशा क्यों हूँ,
मुर्दा हुए लोगों की बस्ती में,
आज तल्क ज़िंदा क्यों हूँ. 

25 टिप्‍पणियां:

  1. प्रिय विशाल जी
    हार्दिक अभिवादन -बहुत ही सुन्दर जज्बात
    बहुत बढ़िया और अनूठा ख्याल लाजबाब प्रस्तुति
    .............आभार आप का

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  2. अस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
    आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

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  3. अक्सर ये पागल सवालात हर अच्छे इंसान के मन में आते है
    सुन्दर रचना विशाल भाई बधाई

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  4. हर तरफ़ है ग़मज़दा चेहरे,
    मुझको हंसी आती क्यों है,
    Bahut khoobsoorat, badhai.

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  5. तमाशबीनों की भीड़ में ,
    मैं ही तमाशा क्यों हूँ,
    मुर्दा हुए लोगों की बस्ती में,
    आज तल्क ज़िंदा क्यों हूँ.

    सही कहा आपने विशाल,यह दुनिया मुर्दा लोगो की ही बस्ती हैं ...पर हमे इनके साथ ही जीवन गुजारना हैं ...मजबूरी हैं ?

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  6. विशाल भाई अब क्या कहूँ
    आज तल्क तो जिन्दा हूँ
    कोई जेहन नहीं मेरे पास
    फिर भी पढता हूँ.
    क्यूंकि आप दिल से लिखते हैं
    दिल के हाथों मैं भी मजबूर हूँ.
    पास आने कि कोशिश में हूँ
    लगता है अभी भी दूर हूँ.

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  7. ....इसलिए विशाल भाई कि आप शायराना तबीयत के शख्स हैं और दीगर लोगोंसे मुख्तलिफ भी.
    " दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
    बाज़ार से गुज़रा हूँ खरीदार नहीं हूँ. "

    उम्दा सोच और इजहारेखयाल !

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  8. मुर्दा हुए लोगों की बस्ती में,
    आज तल्क ज़िंदा क्यों हूँ.
    aham bhaw

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  9. विशाल जी.....बस ऐसी ही पोस्ट की उम्मीद होती है आपके ब्लॉग से........शानदार , बेहतरीन ......बहुत पसंद आई पोस्ट|

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  10. जब सिर्फ़ पढ़ते हैं ज़ेहन वाले,
    मैं दिल से लिखता क्यों हूँ,
    तमाशबीनों की भीड़ में ,
    मैं ही तमाशा क्यों हूँ,

    अजी सबको यही लगता है कि वो ही तमाशा बने हुए हैं ... :):)

    मन के द्वंद को अभिव्यक्त करती रचना

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  11. पुती दीवारें हैं हर तरफ़,
    मैं खाली झरोखा क्यों हूँ,
    सभी तकते हैं जमीं को,
    मैं आसमां तकता क्यों हूँ,

    जीवन्त विचारों की बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना !

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  12. आशा और निराशा के बीच ...डगमगाते मन की खूबसूरत प्रस्तुति ..........आभार

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  13. अंतर्द्वंद को अभिव्यक्त करती मर्मस्पर्शी रचना..........

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  14. beautiful composition ..
    and brilliantly depicting the state of a person who thinks lil offbeat !!

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  15. यह पागल पाने की हालत में नहीं ज्ञानोदय की अवस्था में पूछे जाने वाले प्रश्न हैं.. ये दोनों परस्पर विरोधी दिखने वाली अवस्थाएं वास्तव में एक दूसरे की उपस्थिति सिद्ध करती है!! दार्शनिक प्रश्न!!

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  16. ऐसे सवालात ही ज़िंदगी का मजा देते हैं
    पत्थरों के शहर में फूल खिला देते हैं.
    जज्बातों की खूबसूरती - काबिलेतारीफ

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  17. विशाल जी ,
    ये पागल सवालात ही तो जीवन्तता की निशानी हैं .... बहुत अच्छा लगा पढ़ना ..

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  18. मन में उठती हुई विचारों का अच्छा विश्लेषण

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  19. तमाशबीनों की भीड़ में ,
    मैं ही तमाशा क्यों हूँ,
    मुर्दा हुए लोगों की बस्ती में,
    आज तल्क ज़िंदा क्यों हूँ.

    सही कहा आपने .......
    दुनिया खतरनाक है , उन लोगों की वजह से नहीं जो इसे नुकसान पहुंचाते हैं , उन लोगों के चलते जो चुप बैठे रहते हैं।

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  20. आपकी विशालता है जो सब होते हैं वे आप नहीं. उत्तम रचना .

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  21. आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

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  22. बहुत ही बढ़िया...
    तमाशबीनों की भीड़ में
    मैं ही तमाशा क्यों हूँ
    मुर्दा हुए लोगों की बस्ती में
    आज तल्क ज़िंदा क्यों हूँ

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मंजिल न दे ,चिराग न दे , हौसला तो दे.
तिनके का ही सही, मगर आसरा तो दे.
मैंने ये कब कहा कि मेरे हक में हो जबाब
लेकिन खामोश क्यों है कोई फैसला तो दे.