10 सितंबर 2011

झरोखा

आधुनिकता की अंधी दौड़ में,
टूटा हुआ रिश्ता हूँ मैं,
ग्राहकों की भीड़ में गुम हुए,
इंसान सरीखा हूँ मैं,
इश्तिहार के इस दौर में,
मेरी पहचान न पूछिए,
पुती हुई  दीवारों के बीच,
एक खाली झरोखा हूँ मैं.

20 टिप्‍पणियां:

  1. भीड़ में भी अकेलेपन का एहसास कराती ...
    सुंदर रचना ..
    badhai..

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  2. इश्तिहार के इस दौर में,
    मेरी पहचान न पूछिए,
    पुती हुई दीवारों के बीच,
    एक खाली झरोखा हूँ मैं.

    विज्ञापन के इस दौर में कौन किसकी पहचान जानता है , किसी की वास्तविक और गुणवतापूर्ण पहचान जानने के लिए वक़्त किसके पास है .....एकांत का अहसास करवाती प्रासंगिक रचना ....आपका आभार

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  3. बहुत खूब ....आज के वैश्विक दौड़ में थोड़ी सी खाली जगह की भी बहुत अहमियत है

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  4. आपकी प्रोफाइल फोटो में तो आप 'मोर' जान पड़ते हैं.
    इस सुन्दर कविता से तो आप 'प्योर'जान पड़ते हैं.
    अभी तक जो समझा आपको उससे आप 'कुछ और'जान पड़ते हैं.
    पर खाली झरोखे में जो देखा तो आप 'मोर एंड मोर' जान पड़ते हैं.

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  5. वो शख्स जो कि भीड़ में तन्हां दिखाई दे!!

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  6. वर्तमान की सच्चाई निहित है आपकी इस रचना में....

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  7. पुती हुई दीवारों के बीच,
    एक खाली झरोखा हूँ मैं.

    भावों की सुन्दर विवेचना।

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  8. समय के साथ सभी को चलना चाहिए अकेलापन कभी नहीं आयेगा |

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  9. बहुत सुन्दर विशाल भाई...
    सादर...

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  10. भीड़ में भी अकेलेपन का एहसास कराती ...
    सुंदर रचना ..

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  11. बहुत ही खुबसूरत प्रस्तुती ....

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  12. हकीकत बयान करती यह पोस्ट अच्छी लगी...शुभकामनायें !!

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  13. विशाल जी यह जोड़ना चाहूँगा " गुमनाम सही फिर भी इक नाम हूँ मैं ....."

    सुंदर अभिव्यक्ति !

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  14. बहुत खुबसूरत क्या ज़बरदस्त बिम्ब दिए हैं आपने..........सुभानाल्लाह|

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  15. पुती हुई दीवारों के बीच,
    एक खाली झरोखा हूँ मैं.

    सुंदर अभिव्यक्ति.

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  16. इश्तिहार के इस दौर में,
    मेरी पहचान न पूछिए,
    पुती हुई दीवारों के बीच,
    एक खाली झरोखा हूँ मैं.....

    ख़ूबसूरत..

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मंजिल न दे ,चिराग न दे , हौसला तो दे.
तिनके का ही सही, मगर आसरा तो दे.
मैंने ये कब कहा कि मेरे हक में हो जबाब
लेकिन खामोश क्यों है कोई फैसला तो दे.