30 अक्तूबर 2011

इनायत हो गयी

हुस्न की हम पर इनायत हो गयी,
क़त्ल होने की इजाज़त हो गयी,

हमने तो इक बार सजदा था किया,
उनके कूचे में बग़ावत हो गयी,

हमको उनसे शिकायत क्यों नहीं,
अपनी शराफ़त भी शिकायत हो गयी,

एक आगे तो दो कदम पीछे रखूँ,
उनकी गली जैसे विलायत हो गयी,

देख उसको मुस्कराना छोड़ दो
रक़ीब से काफ़ी रियायत हो गयी.

35 टिप्‍पणियां:

  1. जब सर पर स्नेहिल हाथ की ज़रूरत हो तो अनेक शब्द भी कुछ नहीं कर पाते और अगर ख़ामोशी हो तो कई सोच धराशाई हो जाती है ...bahut khoob

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  2. हमने तो इक बार सजदा था किया,
    उनके कूचे में बग़ावत हो गयी,

    खूबसूरत गज़ल

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  3. आदरणीया रश्मि प्रभा जी,
    आपकी स्नेह भरी टिप्पणी के लिए आभार.
    पर लगता है,टिप्पणी कहीं और पहुँच गयी है.

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  4. एक आगे तो दो कदम पीछे रखूँ,
    उनकी गली जैसे विलायत हो गयी,

    बहुत खूब, वाह

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  5. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 31-10-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  6. एक आगे तो दो कदम पीछे रखूँ,
    उनकी गली जैसे विलायत हो गयी,..

    वाह विशाल जी ... बरबस मुस्कान आ गई इस शेर को पढ़ कर ... प्रेम की अभिव्यक्ति है इन शेरों एमिन ... लाजवाब .,,,

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  7. एक आगे तो दो कदम पीछे रखूँ,
    उनकी गली जैसे विलायत हो गयी,


    लगता है अब हमारा यहाँ क्या काम.
    आपको बुलाएँ तो आप आते नही,और हम बिन बुलाए ही चले आते हैं.

    बिन बुलाए मेहमान की तरह बार बार आना अच्छा तो नही.
    भले ही विलायत क्यूँ न हो.

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  8. एक आगे तो दो कदम पीछे रखूँ,
    उनकी गली जैसे विलायत हो गयी,

    बहुत खूब....

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  9. उम्दा गज़ल विशाल जी...
    सादर बधाई...

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  10. आपका पोस्ट अच्छा लगा । मेर नए पोस्ट पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  11. अच्छे अशार,उम्दा गजल ।

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  12. एक आगे तो दो कदम पीछे रखूँ,
    उनकी गली जैसे विलायत हो गयी,
    .....
    bahut khoobsurat gazhal hai!!

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  13. हुस्न की खुबसूरत सजा ही है जो कत्ल होने में मज़ा देती है..विशाल जी , बेहद खुबसूरत लिखा है . और वो शून्य पर जो लिखा है ..मेरी रचना मुझे विपरीत सी लगने लगी. बहुत अच्छी लगी...शून्य में तुम..

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  14. सुभानाल्लाह..........हर शेर पर वाह निकलता है..........बहुत ही खूबसूरत शेर हैं|

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  15. बहुत खूब, विशाल भाई। महकती सी गज़ल बहुत अच्छी लगी।

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  16. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  17. हमने तो इक बार सजदा था किया,
    उनके कूचे में बग़ावत हो गयी,
    बहुत खूबसूरत.

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  18. हुस्न की हम पर इनायत हो गयी,
    क़त्ल होने की इजाज़त हो गयी,

    मेरे ब्लॉग पर आपका आना मुझे निहाल कर देता है,विशाल भाई.
    आपके आँसूं मेरे लिए अनमोल मोती हैं.
    अब तो आप क़त्ल भी कीजियेगा,तो कोई उज्र नही जी.

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  19. क्या बात है...बेहतरीन!

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  20. behat khubsurat rachna...
    aap meri post par aaye apka hardik dhanyvaad..

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  21. एक आगे तो दो कदम पीछे रखूँ,
    उनकी गली जैसे विलायत हो गयी,..बहुत खूबसूरत शब्द पिरोये है..

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  22. एक आगे तो दो कदम पीछे रखूँ,
    उनकी गली जैसे विलायत हो गयी
    बहुत खूब!

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  23. हमको उनसे शिकायत क्यों नहीं,
    अपनी शराफ़त भी शिकायत हो गयी,

    बहुत खूब...!!

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  24. बहुत खूब विशाल जी

    देख उसको मुस्कराना छोड़ दो
    रक़ीब से काफ़ी रियायत हो गयी.

    :)

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  25. हमने तो इक बार सजदा था किया,
    उनके कूचे में बग़ावत हो गयी,

    vishal bhai ji ...bahut bahut shukriyais sundar gazal ke liye!

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मंजिल न दे ,चिराग न दे , हौसला तो दे.
तिनके का ही सही, मगर आसरा तो दे.
मैंने ये कब कहा कि मेरे हक में हो जबाब
लेकिन खामोश क्यों है कोई फैसला तो दे.