16 जनवरी 2011

उस छत पर

रात के पिछले पहर के 
टिमटिमाते हुए तारे सा टूट कर 
तेरे शहर की उस गली के 
उस मकां  की छत से रूठकर 

एक आवारा बादल की तरह 
मैं चला आया था कभी
सातों समन्दरों में मिटने की गरज से 
खुद को डुबो आया था कभी 

आज फिर वही आवारा बादल 
तेरे शहर में लौट आया है
अपने दामन में यादों की 
नमी को भर लाया है

दिल करता है तेरे शहर की उस गली में
कुछ पल को ठहर जाऊं मैं
अगर तुम इज़ाज़त दो तो
उस छत पे बरस जाऊं मैं

वो छत जिसकी हवा के पन्नो पर 
तुमने मेरे लिए इक पैगाम लिखा था
वो छत जिसकी मुंडेर पर तुने
इक पत्थर के टुकड़े से मेरा नाम लिखा था

उन धुंधले से हुए शब्दों को 
इक बार भिगो आऊँ मैं
अगर तुम इज़ाज़त दो तो
उस छत पे बरस जाऊं मैं

मेरी दुश्मन तो नहीं है लेकिन 
मेरी रकीब है वो छत 
दुनिया की नज़रों से ओझल है 
पर खुदा के बहुत करीब है वो छत

सर को अपने झुका 
इक सजदा तो कर आऊँ  मैं
अगर तुम इज़ाज़त दो तो
उस छत पे बरस जाऊं मैं

उसी छत पे आज मुझे  
शाम के  हराते अन्धिआरे में
दो परछाईया नज़र आतीं हैं
शायद छत की मुंडेर के 
किसी सूखे से गमले में
फिर कोम्पलें खिली जाती हैं

उन अधखिली सुर्ख कलिओं को
फूल बनने   की दुआ दे आऊँ मैं

अगर तुम इज़ाज़त दो तो
उस छत पे बरस जाऊं मैं


11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति| धन्यवाद|

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  2. उसी छत पे आज मुझे
    शाम के घहराते अन्धिआरे में
    दो परछाईया नज़र आतीं हैं

    सगेबोब जी बड़े जिगरे से लिख दी ये बात .....
    क्या कहूँ .....?
    ऐसे में इज़ाज़त खान मिलने वाली है .....?
    फिर भी दुआ है आपकी तमन्ना पूरी हो ....

    मन की सुंदर भावाभिव्यक्ति .....!!

    kripyaa ye word verification htaa lein ....

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  3. यकीन माने दिल खुश हो गया. दिल से निकला लगता है हर एक शब्द और हाँ उस छत पर तो बाढ़ ही आ गयी होगी अगर इजाजत मिल गयी होगी
    वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें इससे सबको असुविधा होगी

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  4. बहुत ग़मगीन हो गया मन... सुन्दर कविता ..

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  5. वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

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  6. बहुत ख़ूबसूरत...बहुत ही प्यारी और..क्या लिखूँ...3-4 बार पढ़ डाला पर हर बार नई लगती सी...वैसे तो हर पंक्ति दिल को छूने वाली है पर निम्न पंक्तियों में न जाने क्या है...
    "मेरी दुश्मन तो नहीं है लेकिन
    मेरी रकीब है वो छत
    दुनिया की नज़रों से ओझल है
    पर खुदा के बहुत करीब है वो छत
    सर को अपने झुका
    इक सजदा तो कर आऊँ मैं
    अगर तुम इज़ाज़त दो तो
    उस छत पे बरस जाऊं मैं"

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  7. बेहद रूमानी..

    प्यार के एहसास की अनूठी अभिव्यक्ति...

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  8. भूल जा कि सजाए थे , मोहब्बत के नुकूश ,
    नक्श का कहना ही क्या बन के बिगड़ जाते हैं

    भाव पूर्ण प्रस्तुति !

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मंजिल न दे ,चिराग न दे , हौसला तो दे.
तिनके का ही सही, मगर आसरा तो दे.
मैंने ये कब कहा कि मेरे हक में हो जबाब
लेकिन खामोश क्यों है कोई फैसला तो दे.