20 जनवरी 2011

शब्दों से परे

प्रिये बैठो मेरे पास 
पर बोलो मत 
अहसास की गहराई को 
शब्दों से तोलो मत

क्योंकि शब्दों के भी पंख निकल आते हैं
शब्द उड़ उड़ के शून्य  में बिखर जाते हैं
कभी पुण्य की, कभी पाप की 
परिभाषा में सिमट जाते हैं शब्द
कभी स्वार्थ की, कभी कपट की 
मिलावट में लिपट जाते हैं शब्द
कभी शर्म की ,कभी गर्व की 
चादर में अटक जाते हैं शब्द
कभी सत्य की, कभी झूठ की 
बनावट में भटक जाते हैं शब्द
कभी अहसानों के बोझ तले दब जाते हैं शब्द
कभी अपने किये वायदे से मुकर जाते हैं शब्द

प्रिये बैठो मेरे पास 
पर बोलो मत 
अहसास की गहराई को 
शब्दों से तोलो मत

क्योंकि शब्द खामोशी की 
जुबाँ बन सकते नहीं 
क्योंकि शब्द ख़ामोशी का सच 
बयाँ कर सकते नहीं
बारिश की रिमझिम बूंदे हैं शब्द 
झील का ठहरा हुआ पानी है ख़ामोशी
सड़क का शोर हैं ये शब्द 
पगडंडी की चुप है ख़ामोशी
ज़िन्दगी सा झूठ हैं ये  शब्द 
मौत सी सचाई है  ख़ामोशी
पर्दूषित हैं ये शब्द शहर के दरिया जैसे
पवित्र है ख़ामोशी ,गाँव का हो कुआँ जैसे

प्रिये बैठो मेरे पास 
पर बोलो मत 
अहसास की गहराई को 
शब्दों से तोलो मत

क्योंकि शब्दों की आग 
भड़कती है बुझ जाती है
ख़ामोशी धीमे धीमे से 
गीली लकड़ी सी सुलगती जाती है
शब्दों के शरीरों के 
चक्रव्यूह में ना उलझ जाओ तुम
ख़ामोशी  की खुशबू की तरह 
मेरी रूह में उतर जाओ तुम
अहसास को शब्दों के 
लिहाफों की जरूरत क्या है?
प्रेम को मंदिर की
दीवारों की जरूरत क्या है?

प्रिये बैठो मेरे पास 
पर बोलो मत 
अहसास की गहराई को 
शब्दों से तोलो मत

42 टिप्‍पणियां:

  1. "अहसास को शब्दों के
    लिहाफों की जरूरत क्या है?
    प्रेम को मंदिर की
    दीवारों की जरूरत क्या है?
    प्रिये बैठो मेरे पास
    पर बोलो मत
    अहसास की गहराई को
    शब्दों से तोलो मत"
    ख़ामोशी की ज़बाँ को इतनी ख़ूबसूरती से बयाँ किया गया है इस कविता में कि ख़ुद ख़ामोशी भी इसे पढ़कर शायद चुप न रह सके...

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  2. .

    मौन की भाषा सबसे अलग होती है , बस उसे पढने और समझने वाला होना चाहिए। शब्दों की ज़रुरत कम होती है। ख़ामोशी सब कुछ बयाँ कर देती है।

    .

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  3. मित्र ,कविता पढकर लगा कि आबले रिसने लगे हैं.

    बहुत बेहतरीन राचना.

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  4. अहसास को शब्दों के
    लिहाफों की जरूरत क्या है?
    प्रेम को मंदिर की
    दीवारों की जरूरत क्या है?

    बहुत ही सार्थक और भावपूर्ण प्रस्तुति..सिर्फ़ अहसास को अहसास ही रहने दो..बहुत सुन्दर

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  5. Kya baat hai ... moun ko bhaasha bana liya aapne to ... sach hai kabhi kabhi shabd apne maayne badal dete hain ...

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  6. प्रज्ञाजी,
    दिव्याजी,
    कैलाशजी,
    आप की टिप्पणियाँ सार्थक होती हैं.प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया.

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  7. हर्षवर्धन वर्मा, धन्यवाद दोस्त.

    आबले रिसने लगे हैं,
    ज़ख्म अब दिखने लगे हैं.

    लगता है ग़ज़ल हो ही जाएगी.

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  8. बहुत ही सार्थक और भावपूर्ण प्रस्तुति| शुक्रिया|

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  9. lo bhayi.....baith gaye ham aapke paas.....nahin bolenge kuchh.....sirf mahsoos karenge aapko...!!

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  10. aapki tippni or smarthan mere liye mahtvpurn hai ....aapke shabdon main kamal ka jadu hai ....aapki kavitayen nishchit rup se mahtvpurn hain ....shubhkamnaon sahit ....aapka apna kewal ram
    kisi karan vash main hindi main tippni nahi kar paa raha hoon ,,,,shighr hi smasya se nijat mil jayegi to har roj milenge ,,,,aapka abhar

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  11. चुप तुम रहो, चुप हम रहें,
    ख़ामुशी को, ख़ामुशी से, बात करने दो!!
    प्रेम के संदर्भ में वैसे भी मौन सबसे अधिक मुखर होता है!!
    (settings में जाकर वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें.. लोग इरिटेट होते हैं)

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  12. @राजीव थेपड़ा
    @ केवल राम :
    @Patali-The-Village
    @दिगम्बर नासवा
    @चला बिहारी ब्लॉगर बनने
    आप सब के प्रोत्साहन के लिए तहे दिल से शुक्रिया.

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  13. मन से मन की बात में शब्दों का स्थान कहाँ ......सुंदर

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  14. आपकी कविता को पढ़ कर लगा जैसे अंदर ही अंदर कुछ पिघलने लगा हो। अपनी बात लिख पाने के लिये शब्द नहीं जुट पा रहे हैं। गहरी अभिव्यक्ति के लिये बस इतना ही कह सकती हूं कि अति सुंदर....

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  15. वन्दे मातरम,
    इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई एवं शुभकामनायें स्वीकार करें |
    गौरव शर्मा "भारतीय"

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  16. बहुत खुबसुरत बोल हे ---प्यार तो वेसे भी मूक हे --मूक प्यार का क्या विश्लेष्ण ---बधाई

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  17. अहसास की गहराई को
    शब्दों से तोलो मत
    बिलकुल सही कहा। शब्द क्या करने की सामर्थ्य रखते है।कई बार जुबां फिसली तो शब्द पता नही क्या कहर ढा देते हैं। सुन्दर चित्रण किया है। बधाई।

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  18. मेरे ब्लॉग जज़्बात पर आपकी टिप्पणी का तहेदिल से शुक्रिया.....उम्मीद है आगे भी आप ऐसे ही हौसलाफजाई करते रहेंगे......

    पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ.....सच कहता हूँ आपकी पहली ही रचना जो पढ़ी तो दिल को छू गयी......सच तो ये है की शब्दों की तो सीमा है और सीमा से परे जो बचता है वही सत्य है और आपकी इस रचना के लिए शब्द नहीं मिल पा रहे हैं मुझे ......आज ही आपको फॉलो कर रहा हूँ ताकि आगे भी साथ बना रहे|

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  19. "अहसास को शब्दों के
    लिहाफों की जरूरत क्या है?
    प्रेम को मंदिर की
    दीवारों की जरूरत क्या है?"


    बिलकुल सही
    मौन सबसे अधिक मुखर होता है
    गहरी अभिव्यक्ति लिये बहुत खुबसुरत रचना
    बधाई

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  20. लगा अपने से बात कर रहा हूं। मित्र अच्छी कविता है।

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  21. Shabdon pe likhi itni sunder rachna ke liye apko badhaee........shabd shabd sunder kavita......lajwab !

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  22. दिलकश अन्दाज़ेब्यां !

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  23. मौन और शब्द दोनों ही बोल पड़े हैं

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  24. आपके ब्लॉग पर शायद पहली बार आना हुआ ....

    मौन मेरा प्रिय विषय है ...बहुत अच्छी प्रस्तुति ...गहन अभिव्यक्ति ..

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  25. बेहतरीन अनूठी कल्पना भावाव्यक्ति ।

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  26. मौन से कहा जाता है बहुत कुछ ...
    सुन्दर कविता !

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  27. प्रिये बैठो मेरे पास
    पर बोलो मत
    अहसास की गहराई को
    शब्दों से तोलो मत.......

    अद्भुत..लाजवाब!!!!!!

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  28. प्रिये बैठो मेरे पास
    पर बोलो मत
    अहसास की गहराई को
    शब्दों से तोलो मत
    wah.kya bolen,behad khoobsurat.

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  29. "अपने लिए लिखता हूँ पर शायद मेरा सच आपका भी सच है "

    जितना भी आपने लिखा है
    लगता है कि......
    सभी का सच उसी में समा गया है !!!
    और क्या लिखूं ?
    सब तो आपने लिख ही दिया हैं ..!!
    मेरी तरफ से लिखने का शुक्रिया !!!!

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  30. क्योंकि शब्दों के भी पंख निकल आते हैं
    शब्द उड़ उड़ के शून्य में बिखर जाते हैं
    कभी पुण्य की, कभी पाप की
    परिभाषा में सिमट जाते हैं शब्द

    बहुत ही खूबसूरत कविता...सुंदर शब्द संयोजन के साथ एहसासों को व्यक्त करती रचना

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  31. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 25-01-2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  32. अहसास को शब्दों के
    लिहाफों की जरूरत क्या है?
    प्रेम को मंदिर की
    दीवारों की जरूरत क्या है?

    क्या कहूँ ……………आपकी रचना पढकर अब यही मन कर रहा हैसिर्फ़ महसूस करो जो आपने कहा है और शायद उन्हे शब्द ढंग से प्रस्तुत भी न कर पाये अहसास सिर्फ़ महसूसने के लिये होते हैं।

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  33. सचमुच, अहसास को शब्‍दों से नापा भी नहीं जा सकता।

    -------
    क्‍या आपको मालूम है कि हिन्‍दी के सर्वाधिक चर्चित ब्‍लॉग कौन से हैं?

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  34. बहुत ही सार्थक और भावपूर्ण प्रस्तुति..

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  35. बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
    बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

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  36. मेरे ब्लॉग पर आपकी बहुमूल्य टिप्पणी मुझे आपके ब्लॉग तक ले आई ! और आपकी कविता पढ़ कर वाह अनायास ही निकल पड़ा ! सारी कविताएँ आपकी बहुत ही खूबसूरत है !
    बहुत बहुत बधाई और मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आपका दिल से आभार वयक्त करता हूँ !!

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  37. बहुत सुन्दर रचना है..रूह से महसूस हुई ..

    अहसास को शब्दों के
    लिहाफों की जरूरत क्या है?
    प्रेम को मंदिर की
    दीवारों की जरूरत क्या है?

    उत्तम ....ऐसी रचना पर टिप्पणी के लिए शब्दों की जरूरत क्या है ??

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मंजिल न दे ,चिराग न दे , हौसला तो दे.
तिनके का ही सही, मगर आसरा तो दे.
मैंने ये कब कहा कि मेरे हक में हो जबाब
लेकिन खामोश क्यों है कोई फैसला तो दे.