26 जून 2011

आज का दौर

इक कसक अपने दिल में,
बसाए हुए रखिये,
शमा ए नाउम्मीदी, 
जलाए हुए रखिये.

ये वो नहीं है दौर,
कि फूलों की बात हो,
बाहों के आस्तीं को, 
चढ़ाए हुए रखिये .

गर दूसरे पे गुजरे ,
तो खामोश हो रहें,
आसमां खुदी को सर पे, 
उठाये हुए रखिये .

जेबें  अगर हो खाली, 
छुपाये हुए रखिये,
कालर पे सफ़ेदी को,
सजाये हुए रखिये.

जो मुस्कुरा दिए तो,
दुनिया कहेगी फूल,
जीने को शकले संग, 
बनाए हुए रखिये .

26 टिप्‍पणियां:

  1. ये वो नहीं है दौर,
    कि फूलों की बात हो,
    बाहों के आस्तीं को,
    चढ़ाए हुए रखिये .

    bahut khoob bina iske hota bhi kuch nahee

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  2. आज के दौर के लिये मुनासिब अपील... जो इसे न अपनाए उसे दुनिया बेवक़ूफ सॉरी फ़ूल कहती है!!

    विशाल भाई! अच्छा तंज़ किया है समाज पर!!

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  3. बहूत सुंदर रचना.......

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  4. सुन्दर रचना। शुभकामनायें।

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  5. "ये वो नहीं है दौर,
    कि फूलों की बात हो,
    बाहों के आस्तीं को,
    चढ़ाए हुए रखिये"

    बहुत सुंदर रचना

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  6. लाजवाब प्रस्तुति,एक तीखा कटाक्ष

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  7. ये वो नहीं है दौर,
    कि फूलों की बात हो,
    बाहों के आस्तीं को,
    चढ़ाए हुए रखिये .


    बेहद शानदार लाजवाब गज़ल ...

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  8. जेबें अगर हो खाली,
    छुपाये हुए रखिये,
    कालर पे सफ़ेदी को,
    सजाये हुए रखिये.

    वाह.....वाह....बहुत उम्दा....

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  9. कविता में
    जज़्बात का बोल-बाला है
    पढने वालों से बातें भी .... !

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  10. जेबें अगर हो खाली,
    छुपाये हुए रखिये,
    कालर पे सफ़ेदी को,
    सजाये हुए रखिये.

    मध्यमवर्ग की यही कहानी है ..

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  11. beautiful sattire.

    विशाल भाई, "मार सुट्ट्या" :)

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  12. ये वो नहीं है दौर,
    कि फूलों की बात हो,
    बाहों के आस्तीं को,
    चढ़ाए हुए रखिये .


    क्या बात है विशाल भाई कमाल दिया आपने तो। बहुत खुब।

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  13. ये वो नहीं है दौर,
    कि फूलों की बात हो,
    बाहों के आस्तीं को,
    चढ़ाए हुए रखिये .

    वाह क्या बात है

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  14. नाउम्मीदी घेरने पर शम्म-ए-उम्मीदी जलाए रखिए॥

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  15. जेबें अगर हो खाली,
    छुपाये हुए रखिये,
    कालर पे सफ़ेदी को,
    सजाये हुए रखिये.

    दुनिया की चकाचौंध का यही सच है.
    बहुत ही उम्दा पेशकश विशाल जी.

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  16. सबसे पहले तो माफी चाहूँगी विशाल जी काफी दिनों से आ नहीं पाई ब्लॉग पर....कुछ अव्यस्त सी व्यस्तताओं ने बाहें फैला रखी थीं उन्हें गले लगाना ज़रूरी था और एक बार गले मिलीं तो जल्दी छोड़ा ही नहीं..समय को ज़िन्दगी से काफी गिले शिकवे थे..दूर करना ज़रूरी था.....अब आपकी रचना - "ये वो नहीं है दौर,
    कि फूलों की बात हो,
    बाहों के आस्तीं को,
    चढ़ाए हुए रखिये ."

    इन पंक्तियों ने एक गज़ब सी हिम्मत की है सच बोल डालने की और उसे हिम्मत मिली है आपकी पूरी रचना से...आप शब्दों से ऐसी नसीहतें दे जाते हैं जो अपनी हरेक पंक्ति में एक स्टेटमेंट होती हैं.....

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  17. वक़्त का तकाज़ा ही कुछ ऐसा है विशाल जी, बताये गए रास्ते से न चल कर उलट चलने में ही भलाई लगती है , पर फिर भी उम्मीद का दामन नहीं छूटता ! आज कल के हालात का सही तज़करा !

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  18. जेबें अगर हो खाली,
    छुपाये हुए रखिये,
    कालर पे सफ़ेदी को,
    सजाये हुए रखिये.

    waha waha bahut khub......sach ka aayinaa

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  19. आज के समय के हिसाब से आपकी सीख प्रासंगिक है.

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  20. नाउम्मीदी के इस दौर में उम्मीद पालने का बेहतर वजह दिया है.आपका जबाव नहीं .

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  21. "इक कसक अपने दिल में,
    बसाए हुए रखिये,
    शमा बस एक उम्मीद की
    जलाए हुए रखिये."

    सारे शेर ही एक से बढ़ कर एक हैं....
    लाजवाब....!
    लेकिन फिर भी उम्मीद बाकी है...!!

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मंजिल न दे ,चिराग न दे , हौसला तो दे.
तिनके का ही सही, मगर आसरा तो दे.
मैंने ये कब कहा कि मेरे हक में हो जबाब
लेकिन खामोश क्यों है कोई फैसला तो दे.